गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

नये साल का स्वागत हो


शनिवार, 15 अगस्त 2009

१५ अगस्त....मेरी दोहरी खुशी

आज १५ अगस्त स्वतंत्रता दिन की बहुत बहुत शुभकामनाएँ!!!!






हमारा तिरंगा हमारे हाथ...

स्वतंत्रतादिवस की बहुत यादें हैं। जब मैं पाठशाला में थी तब १५ अगस्त की तैय्यारी १४ अगस्त की शाम को ही शुरू हो जाती। माँ ने सफेद फ्रॉक खुब साफ धो-धाकर इस्त्री करके रखा हुआ होता था। सफेद कॅनवास के जूते साफ करने महा कठिन कार्य हुआ करता था। हर शनिवार को सफेद जूते पहनकर जाने होते थे और इन बरसात के दिनों में तो उनकी पूरी तरह लग जाती थी। लेकिन १५ अगस्त को पाठशाला में जाना तो एकदम ढाँसू होकर... इसलिए जूते बड़ी मेहनत से साफ कर पानी वाले सफेद पॉलिश से चमकाने की कोशिश की जाती। ऐसे एकदम सफेद फ्रॉक, लंबे बालों को लाल रंग की रिबन लगाकर कसकर दो चोटियाँ और चमकाए हुए सफेद जूते पहनकर पाठशाला में ध्वजावंदन को जाना होता था।

मेरे बच्चों तक यह चित्र थोडा बदल गया था। १५ अगस्त को पाठशाला में जाने का उत्साह कम हो गया था। बस घऱ में बैठो और छुट्टी मनाओ यही ख़्वाहिश रहती थी। कौन सुबह सुहब ७ बजे पाठशाला पहुँचेगा...मस्त आराम करो..सुस्ती में देर से सुबह उठो ऐसे ख़याल ज़्यादा पनपने लगे थे। पर ऐसे दोस्तों के बीच रहते भी रुचिर शिशिर के मन में कभी ऐसा खयाल आया नहीं यह बात मेरे लिए उस समय बहुत मायने रखती थी। शायद जब हम उनकी उम्र के थे तब क्या करते थे, यह सब मैं उन्हें बताती रहती थी, उन बातों का भी असर हो सकता है। रुचिर शिशिर अपने काफी दोस्तों को भी सुबह ७ बजे पाठशाला साथ ले जाने के लिए पटाते थे और सब मिलकर जाते भी थे। मैं ही उनकी सारी तैय्यारी कर के देती थी। बारिश के दिन रहते यदि बारिश है तो उनके पापा उन्हें पाठशाला छोड़ आते थे। पाठशाला में मिठाई मिलती थी। वहाँ चाहे मिले न मिले..मैं घर में रुचिर शिशिर और सब बाकी बच्चों के लिए कुछ तो चीज्जी (कम से कम एक लिमलेट की गोली ही सही..) ला कर रखती थी। पाठशाला में ध्वजावंदन के अलावा किसी शिक्षक ने या मुख्याध्यापक ने १५ अगस्त के बारे में क्या बताया ये पूछती थी। (ज़्यादा कुछ बता नहीं पाते थे क्योंकि ध्वजावंदन और राष्ट्रगीत गाने के अलावा बाकी सब चौपट ही होता था....मेरी तरफ़ से ये सब माफ़.....कुछ भी हो पर बचपन ही था...बचपना तो रहेगा ही...)

आगे चलकर सब बंद होता गया। समय बीतता गया। १५ अगस्त सिर्फ़ टीवी पर देखने तक सीमित रह गया। अमेरिका में आगे की पढ़ाई करने जब रुचिर शिशिर गए तब फिरसे एक बार भारतप्रेम जागृत हो गया। कन्सास के भारतीय दूतावास में वहाँ के वास्तव्य के दो सालों के दौरान ध्वजावंदन के कार्यक्रम में उपस्थित रहे...फोटो खींचे...हमें दिखाए.....





स्वतंत्रता दिन और प्रजासत्ताक दिन...तिरंगे के सम्मान में भारतीय दूतावास में जाते ही रहे हैं पर जहाँ जहाँ भारत का संबंध आता है जैसे सानिया मिरझा का हौसला बढ़ाने बाकी उपस्थित भारतीयों को साथ देने यह जोड़ी भी अपने बड़े तिरंगे के साथ न्यूयार्क पहुँच गई थी। वैसे ही सब दोस्तों को इकट्ठा करके विश्वचषक क्रिकेट का अंतिम सामना भारत से मँगाए गए विश्वचषक वाले टी-शर्ट पहनकर साथ में बैठकर देखा था। अभिमान है हमें हमारे ऐसे बच्चों का...भारत के बाहर रहकर भी भारतीयत्व जतन करने का....
भारत माता की जय...


स्वतंत्रतादिनों की यादें हो गईं....तिरंगे का अभिमान पहले भी था...आज भी है। पर इसके साथ गत ९ सालों से मेरी ज़िंदगी जैसी इंद्रधनुषी रंगों से रंगी है...हमारे 'अभिव्यक्ति' इस साप्ताहिक की वजह से। १५ अगस्त 'अभिव्यक्ति' का जन्मदिन होता है। आज १०वे साल में प्रवेश करनेवाली 'अभि' मेरे ह्रदय के एक कप्पे में विराजमान है। कभी कभी निरुत्साही लगनेवाले जीवनको उत्साह से, आनंद से भर देती है। दिन की शुरुआत सुबह ५.३० बजे संगणक पर 'अभि' के साथ शुरू होकर उसीके साथ समाप्त होती है। 'अभि' को साथ देने 'अनु' जबसे आई....इन रंगों का खुमार और बढ़ गया। इसके साथ रहते कथा-कविता के करीबी रिश्ता बना, जैसे लिखने का स्रोत मिला हो....लिखने का प्रोत्साहन मिला हो....

सन २००० खुशियाँ भरा आया...'अभि' की शुरुआत हुई मासिक अंक से। हर १ तारीख को प्रकाशित होती थी। सब कुछ नया था पर ज़िद भरी थी.. काम करते रहे, और १ जनवरी २००१ से यानी ६ महीने में ही इसे हमने पाक्षिक किया। अब दो अंकों के बीच के १५ दिन बड़े उत्साह से और काम करने में बीतते थे। थोड़ा स्थैर्य और आत्मविश्वास के सहारे नए हिम्मत के साथ १ मई २००२ से वह साप्ताहिक बन गया। महीने के १, ९, १६ और २४ तारीख को प्रकाशित करने लगे। काफी दिन-साल ऐसा ही सिलसिला चलता रहा। कुछ बदलाव हो, कुछ नया हो इसलिए १ जनवरी २००८ से हम 'अभि' हर सोमवार को पाठकों के सामने पेश करते हैं।

९ साल कैसे बीते, भागे...दौड़े पता ही नहीं चला...काम में मसरूफ़ रहे...नया सीखते रहे...कुछ लोग नए मिले..कुछ ने साथ छोड़ दिया.....'अभि' की संपादिका और मेरी ख़ास सहेली पूर्णिमा और मेरे अथक प्रयत्नों की बदौलत और पाठकों की साथ मिलते यहाँ तक का सफल सफर किया है। पाठकों की साथ आगे भी मिलती रहेगी इसका विश्वास भी है...राष्ट्रभाषीय प्रत्येक व्यक्ति का, उसके लेखन का यहाँ हमेशा स्वागत रहता है...

पाठकों की प्रतिक्रियाएँ और सूचनाओं को मद्देनज़र 'अभिव्यक्ति' कुछ खास समय पर खास मौके पर नव-नवीन रूप में आती रहती हैं।
'अभि-अनु' के जन्मदिन मेरे और पूर्णिमा के लिए अपने बच्चों के जैसे एक उत्सव समान होते हैं। फरक बस इतनाही होता है की मैं और पूर्णिमा अलग देशों में होने की वजह से संगणक पर ही साथ रहते हैं और इसलिए 'अभि-अनु' के जन्मदिन भी संगणक पर ही मनाए जाते हैं....अति उत्साह में...अति आनंद में....

दिन-साल के पलटते पन्ने
बहार 'अभि' पर छाई रही
अपने ही पर दूर देश में
भारतीयों को भाती रही
रंग इसके बहुत ही न्यारे
संग मौसम खिलती रही
अपने ही अलग ढंगों से
पूछती कभी बतियाती रही
जनमदिन हो बहुत मुबारक
दिल से दुनिया कहती रही


दीपिका 'संध्या'

शनिवार, 12 जनवरी 2008

इच्छामृत्यु एक वरदान

अब हो जाए कुछ गंभीर बातें....

सुलभ मृत्यु की इच्छा हर इंसान को होती है, लेकिन किसकी पूरी हो कहा नहीं जा सकता। समाज में कई तरह के लोग हैं- गरीब भी और अमीर भी। सारी उम्र तकलीफ़ें सहने वाले, जी जान से मेहनत करके ज़िंदगी मुश्किल से जीने वाले भी और जीवन में सुख सुविधाओं के साथ जीते हुए किसी भी दुख की झलक न पाने वाले भी। हर एक की ज़िंदगी आखिर एक ज़िंदगी है।

सभी लोग आसान मृत्यु की कामना रखते हैं। अब ज़िंदगी है तो उसका अंत भी निश्चित है। कितने ही लोगों को ऐसी ज़िंदगी जीते देखा जा सकता है जिन्हें देख कर ना चाहते हुए भी मुँह से निकल जाता है कि भगवान इसे उठा क्यों नहीं लेता। कई लोग ऐसे हैं जो इस प्रकार की यातनाओं से भरी ज़िंदगी जी रहे हैं और मौत के करीब पहुँचे हुए भी मौत नहीं पा सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए इच्छामृत्यु वरदान सिद्ध हो सकती है। फादर लुई वेदरहेड ने कहा था, 'यह दुख की बात है कि असाध्य रोगों से पीड़ित या जिनके सारी इंद्रिय काम करने में सक्षम नहीं है और शरीर भी ठीक नहीं है ऐसे व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध कृत्रिम मशीनों पर जीवित रखने का प्रयास करनें वालों को ईश्वर शिक्षा नहीं देता।' लेकिन चिकित्सक जान बचाने की शपथ लेते है तो वे जान ले कैसे सकते हैं।

यह सब देखते हुए दुनिया में इच्छामृत्यु का कानून आना कितना ज़रूरी है इस पर सोच विचार चल रहा है। हर व्यक्ति को अपने निर्णय स्वयं लेने का हक है तो फिर यदि कोई व्यक्ति लिख कर देता है- "यदि डाक्टरों के कथनानुसार मैं शारीरिक यातनाओं से मुक्ति नहीं पा सकता तो ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था में कृत्रिम उपचारों पर परावलंबी और लाचारी का जीवन जीने की बजाय मुझे इच्छामृत्यु द्वारा इन सबसे मुक्ति दीजिए।" तो ऐसे इच्छामृत्यु के पत्र को सम्मानित करना चाहिए। इच्छामृत्यु एक वरदान साबित हो सकता है ऐसा कहने से क्या होता है? इसे कहीं भी कानूनी मान्यता नहीं मिल पाई है। इच्छामृत्यु या दयामृत्यु सारी दुनिया में चर्चा या विवाद का विषय बनी हुई है। इसके पक्ष और विपक्ष में बहस जारी है।

बीमारी की हालत में रोगी को कम से कम कष्ट मिले इसके लिए हर डाक्टर प्रयत्नशील होता है। ऐसे ही ऑस्ट्रेलिया के एक डॉक्टर फिलिप हैं। उनका मानना है कि उपलब्ध डॉक्टरी उपायों से यदि रोगी की यातनाएँ ख़त्म नहीं होती और मृत्यु ही अंतिम उपाय हो तो तकलीफ़ें झेलने से बेहतर है उसे सुखद मृत्यु दे दी जाए। उनकी लड़ाई जारी है। अनेक लोग इसका विरोध भी करते नज़र आते हैं। लेकिन वह अपने विश्वास पर अटल हैं। दयामृत्यु या इच्छामृत्यु के वे इतने कट्टर प्रवर्तक हैं कि ऑस्ट्रेलिया में उन्हें 'डॉ डेथ' के नामसे जाना जाने लगा है। जिनके इलाज में मृत्यु ही आख़री इलाज है ऐसे मरीज़ों को तुरंत मृत्यु आए इसलिए उन्होंने ख़ास डेथ मशीन बनाई है। कानून नहीं तोड़ सकते लेकिन उससे बचने का उपाय वे खोज रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुंदर में जहाज़ पर इच्छामृत्यु देने और ऑस्ट्रेलियन कानून को वहाँ निकम्मा बना सकने का उनका प्रयास जारी है। उन्हे पक्का विश्वास है कि उन्हें यश ज़रूर मिलेगा। उनका दावा यह भी है की आज तक २०० से अधिक लोगों ने इच्छामृत्यु का वरदान उनसे माँगा है।

पीड़ा सहन करनेवाले जब इच्छामृत्यु का प्रस्ताव सामने रखते हैं तो सामने वाला भी सोचने पर मजबूर हो जाता है। सब यदि इस विषय पर सोचना शुरू कर दें तो हल कभी न कभी ज़रूर निकलेगा। प्रजातंत्र में जब सत्ता पक्ष ऐसे सामाजिक क्रांति करनेवाले कानून लाने की बात सोचता है तो विरोधी पक्ष उसका साथ नहीं देता। भारत जैसे रूढिप्रिय देश में ऐसे कानून लागू करना असंभव-सा लगता है। यदि यह कानून संभव नहीं हुआ तो ऐसे समय जब यातनाओं से रोगी मुक्ति पाना चाहता हो कृत्रिम उपचारों की तकलीफ़ नकारने का हक तो उसे है ही। इसमें यदि परिवार का सहयोग मिले तो ही यह मुक्ति उसे मिल सकती है। लेकिन ऐसे संबंधी कहाँ मिलेंगे जो इच्छामृत्यु के लिए मंजूरी देंगे? इच्छामृत्यु के बारे में दूसरी तरह से भी सोचा जा सकता है। यदि डॉक्टर को कोई उम्मीद की किरण नज़र नही आती तो ऐसी मौत का सामना करने के लिए डॉक्टर भी उसका साथ दे सकते हैं। रोगी इतने असह्य दर्द में होता है कि वह तो आसानी से मौत को गले लगा सकता है। आसान मौत दिलाने में रोगी का साथ देना उसकी जान लेना नहीं माना जा सकता। इससे यह भी नहीं सोचा जाना चाहिए कि डॉक्टर ने अपना सेवाधर्म या ईमान छोड़ दिया है।

ऐसे भी कई लोग हैं जो जन्मजात रोगी हैं, शारीरिक और मानसिक दृष्टि से लाचार है। हालाँकि समाज और परिवार वाले ऐसा सोचते नहीं लेकिन वे एक तरह से परिवार पर भी बोझ बने हैं। ऐसे लोगों को इस बोझ का अहसास तक नहीं है। उनके लिए डॉक्टर या परिवार के सदस्य उनकी इच्छामृत्यु का निर्णय कर सकते हैं। नीदरलैंड में ऐसी इच्छामृत्यु की शुरुआत हुई है। इसके साथ ही जब नया पैदा हुआ बच्चा ख़ामियों से भरा हो, और आगे का जीवन उसके लिए भयावह हो तो भी उसे मौत दे दी जाती है। इसमें सबका सहयोग मिलता है जो बड़ा ही आवश्यक है।

डॉ। केव्होरकीयन ने खुद अमेरिका में ८० से उपर ऐसे लोगों को मौत दिलाने में सहायता की है जो जीवन से ऊब चुके थे। उन्हे सबका सहयोग प्राप्त हुआ है। तत्काल मृत्यु की तरकीबों को वे ज़्यादा सहायक मानते हैं जिससे इच्छामृत्यु में ज़्यादा तकलीफ़ ना हो।कई मरीज़ ऐसे भी हैं जो अपनी इच्छाशक्ति और आत्मशक्ति के बलबूते पर दुख झेलने का हौसला जुटा लेते हैं। लेकिन अधिकतर लोग बीमारी का नाम सुनते ही शुरू से हार मान लेते हैं। ऐसे उम्मीद खोए हुए लोगों को अंत में यह प्यार भरी मौत ही पार लगा सकती है।

यह बात तो उतनी ही सच है कि ऐसी मौत किसी को बहाल करना आसान बात नहीं हैं। लेकिन रोगी की बार-बार इच्छामृत्यु की माँग, डॉक्टर की सहमति और परिवारजनों का सहयोग काफ़ी हद तक इच्छामृत्यु की बात को सफलता दिला सकता है। देखना यह है कि क्या इसे कभी कानूनी मान्यता प्राप्त हो सकेगी और यह व्यवहार में आ पाएगी?


दीपिका 'संध्या'

शनिवार, 5 जनवरी 2008

एक बार फिर पाठशाला जाना है

हमारा ज़माना कृष्ण-धवल वाला था, कितनी मीठी वह यादें हैं अपने पाठशाला की। मन में बसी, आज मैं जो हूँ उसमें उनका बहुत बड़ा सहभाग भी है। समय ऐसे भागा है सालोंसाल बीत गए हैं... बाद में बच्चों के पाठशाला के दिन भी खत्म हुए भी आज काफ़ी समय बीत गया है... उनके पाठशाला के दिनों में मैंने मेरा बचपन थोड़ा-बहुत तो जिया ही है... दोनों में फर्क तो बहुत था...पर फिर भी...


एक बार एक मराठी कविता मेरे पढ़ने में आई, बहुत दिनों पहले की बात है। उस समय दिल को बहुत छू गई थी, सहज लहजे में पर एकदम खरी-खरी... आज दुबारा उस कविता की ना जाने कैसे स्मृतियाँ जागी हैं। याद करने की कोशिश की और हिंदी में उसी आशय की कविता आपके सामने रख रही हूँ...



पाठशाला जाना है

एक बार फिर पाठशाला जाना है

दौड़ कर बैठूँगा मैं उसी बेंच
राष्ट्रगान सब के साथ मिल कर गाना है
नई कापी की खुशबू सूँघ कर
नाम मुझे उस पर माँ से लिखवाना है
एक बार फिर पाठशाला जाना

छुट्टी होते ही वॉटर बॉटल छोड़कर
नलके को हाथ लगा कर पीना पानी है
दौड़ते भागते डब्बा ख़तम कर
नमक मिर्च से बेर औ' इमली खानी है
यदि बारिश आए तो पाठशाला से छुट्टी
शायद मुझे कल ही करवानी है
गहरी नींद सोना है, यही ख्वाब ले कर
अचानक छुट्टी का आनंद मुझे पाना है
इसलिए एक बार फिर पाठशाला जाना है

लंबी घंटी बजते ही हुई घर की छुट्टी
दोस्तों संग साइकिल रेस लगानी है
दिवाली की छुट्टी की राह देखते
पढ़-पढ़ के छमाही परीक्षा भी निभानी है
खूब अनार चकरी कल चलाए थे
अधजली फुलझड़ी फिर ढूँढ़ लानी है
छुट्टी का यह किस्सा, दोस्तों को सुनाना है
इसलिए एक बार फिर पाठशाला जाना है

ज़िम्मेदारी के बोझ से अच्छा है
मैं उठा लूँगा भारी बस्ता मेरा
वातानुकूलित ऑफ़िस से अच्छा है
स्कूल में बिन पंखे का कमरा मेरा
अकेली कुर्सी से लाख अच्छा है
कक्षा का टूटा हुआ बेंच मेरा
दो की बेंच पर तीन दोस्तों को बैठाना है
इसलिए एक बार फिर पाठशाला जाना है।

सुना था, बचपन बहुत प्यारा होता है
कुछ-कुछ समझ में आज आने लगा है
सच में यह सच है? सर से पूछकर आना है
इसलिए एक बार फिर पाठशाला जाना है।

दीपिका 'संध्या'

बुधवार, 2 जनवरी 2008


८-९ सालों से जीवन में ऐसा बदलाव आया की सोचती हूँ मैं कहाँ की कहाँ पहुँच गई हूँ। ज़िंदगी को नए आयाम मिले हैं। जबसे अभि-अनु की शुरुआत हुई तबसे वे मेरे दिल के बहुत करीब हैं। उनके साथ हर पल बहुत ही खुशी में जी रही हूँ। लिखने पढ़ने के साथ अभि-अनु का काम करने में बहुत ही उत्साह-सा महसूस करती हूँ। उनकी बदौलत जाने कितने नए लोग मिले, पहचान बढ़ी। साहित्य के विविध रुपों से पहचान हुई जो शायद ना पहले हुई थी ना ही उनके बिना कभी बाद में होती। उन रुपों को कभी-कभी काग़ज़ पर उतारने की कोशिश करती हूँ।
१ जनवरी को अब अनु ने आठवे साल में कदम रखा है। उस खुशी में ये चार शब्द....

अनुभूति को जन्मदिन की हार्दिक बधाई

अनुभूति हमारी आठवे साल में आई

हर हफ्ते कविताओं का इसमें खज़ाना
काव्य के हर पहलू से परिचय कराना
आकर्षक लगती हर रूप में जब आई
अनुभूति हमारी आठवे साल में आई

काव्य संगम हो, चाहे हो किशोर कोना
नई हवा, अंजुमन, चाहे हो पाठकनामा
जग भर बसे कवियों को ढूँढ ये लाई
अनुभूति हमारी आठवे साल में आई

दिन दूनी रात चौगुनी अनु फले फूले
सुंदर रचनाओं की हमें सौगात मिले
कविता लिखने की स्फूर्ति सबने पाई
अनुभूती हमारी आठवे साल में आई

दीपिका जोशी 'संध्या'

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007

नव वर्ष अभिनंदन


मंगलवार, 11 दिसंबर 2007

कुछ दिल की बात!!

मित्रों....

जीवन में आपाधापी या उठापटक न हों तो जीवन कैसा! कुछ ऐसे मौके आते हैं जिन पर हम बार-बार ग़ौर करते हैं, उसी को सोचते हैं। ऐसी कुछ बातें किसी के साथ बाँटने को दिल भी करता है। ऐसी ही है यह मेरे दिल की बात। दोहरी खुशी के वे पल आज भी मेरे जीवन में बड़े मायने रखते हैं। शायद पढ़कर आपको भी मज़ा आएगा यह सोच कर आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ।

२८ साल पुराना यह वाक्या है। जब पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ तब मैं २१ साल की थी। आज जब सोचती हूँ तब ऐसा लगता है कि शर्म के मारे होगा लेकिन यह खुशी मैं ज़ाहिर ही नहीं कर पाई थी। पाँचवे महीने में ही डॉ. ने जुड़वा होने का शक ज़ाहिर किया था। शक के घेरे में और हाँ या ना की दुविधा में और दो महीने निकल गए। २८ साल पहले सोनोग्राफ़ी नहीं थी सो आठवे महीने में एक्स रे के बाद जुड़वा होने का शक यकीन में बदल गया। एक साथ दो-दो आएँगे इसका मुझपर क्या असर हुआ था याद नहीं लेकिन हमेशा से कुछ हट कर होनेवाला है यह बात ज़रूर समझ में आई थी। कहने के लिए वंशानुगत होनेवाला यह जुड़वा का किस्सा परिवार में किसी की जुबान से आजतक सुना नहीं था। इसकी मुझे बड़ी खुशी है कि यह परंपरा मेरे परिवार में मैंने शुरू की है। पूरे दिनों बाद मुझे दो तंदुरूस्त प्यारे बेटे हुए। दोनों में ९ मिनट का अंतर हैं। अस्पताल में जुड़वा बच्चों को देखने के लिए मेरे कमरे में भीड़ लगी रहती थी। लड़की में ज़्यादा दिलचस्पी रखनेवाली मैं मन में थोड़ी उदास-सी हो गई। दो में एक बेटी होती तो सोने पे सुहागा होता यह बात २८ साल बाद आज भी मेरे मन में आए बिना नहीं रहती। बेटा हो या बेटी माँ बनना हम औरतों के जीवन में एक सुखद अहसास है। लेकिन यही अहसास ९ मिनिट में दो बार अनुभव करना कितना सुखद होता है यह मेरे जैसी जुड़वाँ बच्चों की माँ ही समझ सकती है।


मैंने उनके नाम रुचिर और शिशिर रखे हैं। जब मैं छोटी थी तब से मुझे छोटे बच्चों से लगाव था। हमेशा आस-पड़ोस के बच्चों के साथ खेलती हुई नज़र आती थी। इसलिए जब मेरा माँ बनने का समय आया तब भगवान ने भी मेरा छोटे बच्चों का शौक ज़रा ज़्यादा ही पूरा कर दिया। मैंने भी बड़ी खुशी से यह बात स्वीकार कर ली थी।

जुड़वा होने केबावजूद शुरू में वे शकल से काफ़ी अलग लगते थे। दोनों ने कभी भी किसी भी बात में दुखी नहीं किया इसलिए शायद सँभालने में दिक्कत नहीं आई। ७ या ८ महिने बाद काफ़ी एक जैसे लगने लगे थे। आमने-सामने दोनों को रखा तो अपने सामने अपने जैसे को देख कर ही शायद मुस्कुराए थे। सेहत और लंबाई में कोई फ़रक नहीं था। एक जैसे कपड़े पहनाती तो देखनेवालों का कौतूहल बढ़ जाता था।


एक मज़ेदार किस्सा बताती हूँ, जब दोनों ३-४ साल के थे, मुझे सभी पूछते थे, 'इनमें बड़ा कौन है?' ऐसे ही एक बार मुझे सवाल पूछे जाने पर मैंने जवाब में कह दिया, 'रुचिर बड़ा है।' वहाँ बैठा शिशिर सब सुन रहा था। उसे यह बात जची नहीं। तुरंत वह बोल पड़ा, 'नहीं, हम जुड़वाँ भाई हैं सो हम तो बराबर के हैं।' उस समय तो जुड़वा का मतलब समझते ही नहीं थे। हमसे सिर्फ़ सुनी हुई बातें थी। लेकिन उसके बाद ऐसा कहने की गलती मैंने दुबारा नहीं की। जब स्कूल जाने लगे तब उनके दोस्तों को और शिक्षकों को उन्हें पहचान पाना मुश्किल लगता था। पर शायद ही कभी उन्होंने इसका फ़ायदा उठाया हो। जब कभी उनकी तरफ़ देखकर कोई कहता 'लगता हैं जुड़वाँ हैं' तो दोनों ही इस बात का मज़ा लेते थे।
जब तीसरी कक्षा में पढ़ते थे तब की बात है। उनके स्कूल में रोज के ताज़े समाचार सुबह की प्रार्थना के समय कोई एक विद्यार्थी सुनाता था। एक दिन रुचिर की बारी थी, उसने सुनाए। दो दिन बाद शिशिर को कहा गया। जब वह मंच पर पहुँचा, उनके प्रिन्सिपल ने कहा, "दो दिन पहले तुमने सुनाए थे, आज किसी और को सुनाने दो।" यह बात सुन कर कोई भी हँसे बिना नहीं रह सका। तब इन जुड़वाँ भाइयों के बारे में प्रिन्सिपल को बताया गया। उन्होंने दोनों को मंच पर बुलाया। सबने तालियाँ बजाकर उसका मज़ा लिया। उस समय उन्हें कैसा महसूस हुआ था यह पूछने पर भी वह बता पाने मे शायद असमर्थ हैं।


पढ़ाई में वैसे दोनों अच्छे हैं लेकिन 'एक समान नंबर कैसे मिलेंगे!' ऐसे नाजुक मामले में मुझे बहुत सँभल कर चलना पड़ता था। दोनों का दिल रखने के लिए मुझे नये-नये तरीके अपनाने पड़ते। जुड़वा बच्चों की मानसिकता कैसी होती है यह जानने के लिए मैंने किताबें पढ़ीं थीं। उन्हीं के सहारे दोनों का मन सँभालने की कोशिश करती थी।
जैसे थोड़े बड़े हुए 'यह तेरा' 'यह मेरा' की बातें आ गई। एक दूसरे की चींज़े इस्तेमाल करना नामंजूर होने लगा था। घर में लड़ते लेकिन घर के बाहर एक दूसरे के प्रति भाई होने का फ़र्ज़ खूब अदा करते। यह देखकर मेरे दिल को बड़ा सुकून मिलता था। एक दूसरे के वे अच्छे दोस्त हैं ही लेकिन उसके भी परे उन दोनों के बीच में ऐसा भी कुछ बंधन होगा जो शायद जुड़वां ही महसूस करते होंगे। कहते हैं जुडवा बच्चों को अलग नहीं रखना चाहिए यह बात सच ही है।


हमने शुरू से ही उन्हें स्पर्धात्मक परिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया है। पाँचवी क्लास में थे तब महाराष्ट्र में होनेवाली सैनिक स्कूल की प्रवेश परीक्षा दी थी। ज़रा कठिन होती है लेकिन मैंने हौसला अफ़ज़ायी भी खूब की थी। मेहनत करने से कभी नहीं हारने वाले दोनों ने बड़ी लगन से पढ़ाई की। पहले दस में पास हुए थे। बाद में साक्षात्कार के लिए सातारा जाना था। नौ साल की उम्र में सैनिक अफ़सरों के सामने जाना आसान नहीं था। लेकिन बड़े हौसले के साथ इस जोड़ी ने वह भी कर दिखाया। वैसे ही उनके शब्दकोष में डर शब्द कहीं नहीं है, अब और भी हिम्मत बढ़ गई थी।


दोनों आठवी कक्षा में थे तब उनके पापा नौकरी के बहाने विदेश चले गए। अब इन जवान हो रहे बच्चों की ज़्यादा ज़िम्मेदारी मुझ पर आ गई। लेकिन जैसे उलटा ही हो गया, उन दोनों ने मेरी ज़िम्मेदारी सँभाल ली हो। खुद को काफ़ी समझदार बना लिया था। तेरह चौदह साल की उम्र में ही उनका बचपन खो सा गया, इस बात का मुझे हमेशा अफ़सोस रहेगा। अब मैं ही उनकी दोस्त बन गई थी। हर पहलू पर हमारी बातचीत होती थी।
कितना भी छोटा-सा काम हो लेकिन करेंगे दोनों साथ में। तीन पहिए और दो पहियों वाली साइकिलें अलग ली थीं। लेकिन तब भी लड़ते थे। पर एक ही स्कूटर खुशी-खुशी बाँट लिया। स्कूटर चलाना दोनों को पसंद लेकिन समझदारी दिखाकर बारी-बारी से चलाते। दो पहियों वाली साइकिल मैंने उन्हे उनके पीछे दौड़-दौड़ कर सिखाई थी। उन्हीं बेटों ने पीछे बैठ कर मुझे स्कूटर चलाना सिखाया। उस समय मैंने महसूस किया अब दोनों सच में बड़े हो गए हैं।


दसवी और बारहवी में बड़ी मेहनत से अव्वल आए थे। दोनों ने पुणे से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पदवी हासिल की। हम पति-पत्नी कुवेत में हैं और वे आगे की उच्च शिक्षा लेने अमेरिका गए जहाँ पढ़ाई पूरी हो जाने के पश्चात अब नौकरी में व्यस्त हैं। सभी परिवारजनों से दूर होने की वजह से वे दोनों ज़्यादा ही एक दूसरे के करीब आ गए हैं और सच्चे दोस्त बनें हैं।


बाकी जुड़वा बच्चों के मम्मी पापा का क्या अनुभव होगा मुझे पता नहीं। लेकिन हमारें बेटों ने हमेशा हमारा सम्मान बढ़ाया ही है। इसलिए अभिमान से कहना चाहती हूँ, जब बेटे हों, जुड़वाँ हों और हमारे बेटों जैसे हों। मेरी पिछले जनम की कोई पुण्याई तो नहीं जो ऐसे गुणी हमेशा खुश और समाधानी रहनेवाले बच्चों की माँ बनी। मैं मेरे बेटों के साथ हमेशा सख्त थी। उस सख्ती का असर आज अच्छा ही है ऐसी मेरी समझ है। उस सख्ती की उनके मन में कड़वाहट है क्या यह जानने की कोशिश मैंने की है लेकिन मैं अभी भी उलझन में हूँ।


जब वे पैदा हुए तबसे जुड़वा बच्चों को सँभालने की तकलीफ़ें थोड़ी-सी थीं लेकिन दोनों को एक साथ बढ़ते देखने की खुशी जो मुझे आज तक मिल रही है उसका जवाब नहीं।


दीपिका जोशी 'संध्या'







बुधवार, 3 अक्टूबर 2007

पूनम, अश्विन और मैं


मराठी भाषी होने के साथ हिंदी से भी लगाव रहा। वेब पर खाली समय बीतने लगा। दोस्त मिले, साथ वेब पर उपलब्ध भंडार से काफ़ी कुछ सिखना हुआ। आगे बढ़ते रहने की कोशिश जारी है, आज यह ब्लाग बनाने का ख़याल आया। ब्लाग की शुरुआत पुरानी यादों के साथ करना चाहूँगी जब अभिव्यक्ति और अनुभूति का विचार पूर्णिमा वर्मन के मन में आया था। सबकी मेहनत रंग लाई - आज मैं, अश्विन गांधी और पूर्णिमा मिलकर 'अभि-अनु' को आगे लिए जा रहे हैं। इन दो करीबी दोस्तों से काफ़ी कुछ सीखा है मैंने। इन अच्छे दोस्तों के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखी थी वो आपके सामने रखना चाहती हूँ।

प्यास थी एक बूँद की
सागर मैंने है पाया

चाह थी एक फूल की
गुलशन मैंने है पाया

आस थी अच्छे दोस्तों की
पूनम अश्विन को मैंने है पाया।

आज के लिए बस इतनाही ---

दोहे - क्या समझाए ये गुलमोहर

भर गरमी में भी गुलमोहर के रंगों ने समा बाँध रखा है। चलते-फिरते ये गहरे लाल फूल हवा के झोंके के साथ होले से शायद कुछ गुनगुना गए। वही गुनगुनाहट -कुछ दोहे

उन्हीं गुलमोहर के फूलों के नाम


निखरा रंग हर फूल का आँगन की है शान
दिलकश खिलता गुलिस्तां रखता सबका मान

झुकी झुकी है डालियाँ लुकीछिपी है छाँव
गुलमोहर बुलाए तले थके पथिक के पाँव

कानों में गुनगुन करे बतियाती है डाल
दोपहरी जल जल मरे हँसे गुलमोहर लाल

गुलमोहर रंगने लगा दोपहरी सुनसान
धीमा झोंका हवा का एक सुरीली तान

सिंदूरी कालीन पर गुलमोहर शालीन
तन का हिंडोला डुले मन काहे गमगीन

ना रूठ यों गुलमोहर नहीं बिखर हवा संग
शृंगार हो मौसम का ओढ़ा दो लाल रंग

गरम थपेडे बह रहे गुलमोहर मुस्काए
हर मौसम में खुश रहो यही समझाए

दीपिका
जोशी 'संध्या'

आँसू

आँसुओं, तुम क्या हो?

अधखुली-सी
सीपियां पलकों में
मोती जैसे चमकते तुम

खुशियों में
गालों पर रिसते
ग़म में नहीं सँभलते तुम

सिमटे हो
एक बूँद में कभी
कभी सागर बन जाते तुम

काव्य में
किसी की हो प्रेरणा
सुर संगीत बन जाते तुम

आँसुओं!
ऐसे न बिखरो
बेशक बहुत अनमोल तुम

दीपिका जोशी 'संध्या'

खुद को बदलें

एक दिन रोज़ का समाचार-पत्र पढ़ते-पढ़ते एक छोटे से लेख पर नज़र गई, और बात दिल को ऐसे छू गई, आप सबके साथ बाँटना चाहती हूँ।

वेस्टमिनिस्टर
अबे बिशप के क़ब्र पर संदेश लिखा हुआ था- ''मेरी जवानी में मुझे कोई ऐसी ज़्यादा ज़िम्मेदारियाँ नहीं थीं। मेरी कल्पनाशक्ति को कोई सीमाएँ नहीं थीं। उस समय मैं पूरे जग को बदलने के ख़्वाब देखता था। उमर बढ़ती गई, अनेकों अनुभवों से मैं रोज़ हर मोड़ पर कुछ न कुछ सीखता और होशियार होता चला गया। मुझे यह बात समझ में आ गई कि पूरे जग को बदलना संभव नहीं। इसलिए मैंने मेरे बस में अपने देश में कुछ बदलाव लाने की ठानी। थोड़े ही दिनों में यह भी आसान नहीं लगा।
उम्र की साँझ होने को थी, क्यों न एक कोशिश अपने परिवार में ही हो जाए, पर ओह!! ये क्या, यहाँ भी कितनी ढ़ेरों दिक्कतें इस आसान से लगने वाले काम में। आज मैं मृत्युशैय्यापर हूँ और अचानक साक्षात्कार हुआ कि सबसे पहला बदलाव मैं खुद में ला सकता था। हो सकता है कि मेरा ही आदर्श सब मेरे अपनों में कुछ अच्छे बदलाव ला सकता था। ऐसा ही मैं आगे बढ़ता और क्या पता अपने देश के साथ पूरे जग की कायापलट कर भी देता। ख़ैर. . .''

रविवार, 23 सितंबर 2007

कैसी कैसी सोच...

माँ का दर्जा तो है ही ऊँचा...पर कभी-कभी ऐसा भी होता है...मन में उठने वाले विचार ऐसे हो सकते हैं...मुझे बहुत ही भा गए, आप भी मेरे विचारों से शायद सहमत होंगे।


मेरी सोच में...

मैं चार साल का था- मेरी माँ कुछ भी कर सकती है...शी इज द बेस्ट!
आठ साल का था - मेरी माँ को बहुत कुछ समझता है...समझे नं?
बारह साल का था- मेरी माँ मुझे समझती ही नहीं।
पंद्रह साल का था- ओह! मेरी माँ जहाँ-तहाँ आड़े आती है, कुछ करने ही नहीं देती।
अठारह साल का था- कमॉन मॉम, मैं अब कायदे से सज्ञान हूँ। मेरे झमेले में मत पड़ो।
पच्चीस साल का था- शिट यार, उस समय माँ की बात मान लेनी चाहिए थी।
पैंतीस साल का था- कुछ भी करने से पहले एक बार माँ को पूछ लो तो अच्छा होगा।
पचास साल का हुआ तब- आज इस बारे में माँ का क्या कहना होता, भगवान ही जानते हैं।
पैंसठ साल का हूँ तब- आज माँ रहती तो. . . .

मंगलवार, 28 अगस्त 2007

अगाध मित्रता के नाम. . .

गरज के लिए दोस्ती का नाता मत जोड़ना
जब चाहा सहजता से ऐसे ही मत तोड़ना

रिश्ता नहीं खून का, कौड़ीमोल पर नहीं
भावनाओं का दाम भी न लगा यों कहीं

जीवन पथ पर नया नाता जुड़ता जाएगा
बिन सोचे भर-भरके प्यार झोली में आएगा

हाथ आगे कर यार, कोई शरम की बात नहीं
पर व्यवहार, लेन-देन बीच कभी आए नहीं

मिलेगा उतना लेते रहो, जो बने देते ही रहो
फिर माँग लो जब हाथ अपने खाली पाओ

समाधान में है सुलह, सिर्फ़ इतना समझ लो
रिश्ता कोई बोझ नहीं, दिल से इसे जान लो

विश्वास के चार बोल, और कुछ नहीं माँगता
प्यार यों ही बना रहे, बस इतना मैं जानता

माँ को मैंने जाना

घर में सुबह-सुबह की भागदौड़ शुरू हो गई थी।''राहुल, पढ़ाई पूरी हो गई क्या? चलो जल्दी, स्कूल को देर हो रही है।''''हाँ माँ, हो गई पढ़ाई, ये देखो 'मेरी माँ' पर निबंध लिखना था, मैंने लिख लिया है। मेरी माँ सुबह मुझे जल्दी उठाती है, पढ़ाई करवाती है, मुश्किलें आएँ तो समझाती है, कहानियाँ सुनाती हैं, मेरे बीमार होने पर डॉक्टर के पास ले जाती है वगैरा, ठीक है न माँ?''''हाँ हाँ, चल जल्दी बॅग भर, डिब्बा रखो और जाओ स्कूल।'' माँ ने राहुल को मदद की और स्कूल के लिए रवाना कर दिया। शाम को राहुल स्कूल से आया पर उदास था। टीचर को किसी भी बच्चे का निबंध पसंद नहीं आया। सभी ने एक जैसा ही लिखा था। टीचर ने अब कुछ माँ की पहलुओं पर ग़ौर कैसे किया जा सकता है इस पर रोशनी डाली और दुबारा लिखने का मौका सभी बच्चों को दिया गया। माँ की पसंद, तुम लोग उसके लिए क्या करते हो, उसकी पढ़ाई, उसके छंद, घर के बाकी सदस्य उसके परिश्रम के बारे में क्या सोचते हैं, इन बातों पर सोचने को कहा। यदि चाहो तो घर के वाकी सदस्य जैसे पिताजी दीदी भैय्या से मदद ले सकते हैं पर अपनी माँ को कोई कुछ नहीं पूछेगा। ''आठवी कक्षा के विद्यार्थी हो सब, विचारपूर्वक लिखना अब आना ही चाहिए।'' टीचर ने कहा।क्लास के सब बच्चे सोच में पड़ गए। देखा जाए तो मुश्किल, देखा जाए तो आसान भी।
जैसे राहुल घर पहुँचा, माँ की हर हरकत, उसके काम करने का तरीका, और बाकी भी, निरखना-परखना शुरू कर दिया। ''माँ की पसंद क्या होती है, मैं सिर्फ़ आलू की ही सब्ज़ी खाता हूँ, माँ सब सब्ज़ियाँ, चटनियाँ खाती हैं। सबको ताज़ा खाना खिलाती है, कम पड़े तो दो निवाले कम भी खाती है। फेंकना न पड़े इसलिए दूसरे दिन खुद बाँसा खाना अपनी थाली में लेती है। हम कभी माँ को ऐसा नहीं कहते कि आज मुझे बाँसा खाना दे देना और तुम ताज़ा खा लेना। मैं शायद छोटा हूँ पर दीदी भैय्या भी तो नहीं कहते ऐसा।
मुझे टेबल टेनिस पसंद है। माँ ने मेरे जन्मदिन की राह देखे बिना ही टेनिस की रैकेट दिला दी। माँ को कौनसी चीज़ पसंद है? हाँ!! माँ को पढ़ने की और हारमोनियम बजाना बहुत पसंद है। किताब खरीदने का कभी-कभार कहा भी हो, पर महँगी है सोचकर उन्हीं पैसों में दीदी के लिए किताब खरीदती है। हारमोनियम कब का खराब हुआ पड़ा है। एक-दो बार माँ ने शायद सुझाव भी दिया था उसे ठीक करने का, पर किसे फ़ुर्सत! ऐसे ही कोने में रखा हुआ, एक चद्दर से ढँका हुआ पड़ा है।
रंग कौनसा पसंद करती है माँ? कुछ समझ में नहीं आता क्योंकि माँ कभी खुद की पसंद की साड़ी ख़रीदते मैंने नहीं देखा। शादी-ब्याहों में मिली हुई साड़ियाँ ही अक्सर वह पहनती है, चाहे जिस रंग की भी हो। पर याद आया, उसने चादर हल्के नीले रंग की खरीदी थी।
माँ का जन्मदिन कब होता है? माँ को ही पूछना चाहिए. . .पर नहीं, टीचर ने माँ से किसी भी सवालों के जवाब जानने के लिए मना किया हुआ है, चलो दीदी से पूछा जाए। ''दीदी, माँ का जन्मदिन कब होता है?'' ''अरे! १२ सितंबर को।''मुझे तो कभी याद नहीं कि ये दिन आजतक कभी हमने मनाया हो। पर माँ मेरा, दीदी का और पापा के जन्मदिन पर सबके पसंदीदा पक्वान बनाकर ज़रूर खिलाती है। माँ को कौनसी मीठी चीज़ पसंद है? कभी ग़ौर ही नहीं किया। ''पापा, माँ को कौनसी मीठी चीज़ पसंद है, आपको मालूम है?''पापा मेरे उपर गुस्सा होते हुए कहने लगे, ''देख नहीं रहे हो, मैं काम में हूँ, माँ से ही क्यों नहीं पूछ लेते, मुझे क्या मालूम?''
जब कभी हममें से किसी को भी पिकनिक पर जाना होता है, सुबह जल्दी उठकर गाजर का हलवा, नमकीन पूरी बना कर देती है। वो कब जाती है ऐसे पिकनिक? एक बार ही माँ ने महिला मंडल की सहेलियों के साथ पिकनिक जाने का सोचा था, पर उसी दिन पापा ने अपने दोस्तों को खाने पर बुला लिया तो वह जा नहीं पाई थी।पढ़ाई का सोचता हूँ तो एक बार माँ ने बातों में बताया था कि उसे डॉक्टर बनना था पर दोनों मामा की पढ़ाई के लिए माँ की पढ़ाई रुकवा दी गई। शादी के बाद घर-गृहस्थी में ऐसी उलझ गई की बात नहीं बनी।
दैनिक अख़बार पढ़ना बहुत पसंद है उसे पर हम बच्चों का अंग्रेज़ी का ज्ञान बढ़ाने हेतु हमारे घर में हिंदी अख़बार की जगह अंग्रेज़ी अखबार ने ले ली। तब से बेचारी का अखबार पढ़ना भी न के बराबर। टीवी भी पापा को अंग्रेज़ी खबरें, दीदी केबल पर आनेवाली उसकी मनपसंद पिक्चरें और मैं कार्टून, इन सब में से जब यदि कोई समय बचता है तभी वो उसे मनपसंद प्रोग्राम शायद देख लेती है।
बाहर घूमने जाने का मौका भी माँ के नसीब में बहुत ही कम आता है। पापा ऑफिस से थक कर आते हैं, छुट्टी के दिन दोस्तों से मिलना, समय बीताने के हेतु उनसे ताश खेलना, दीदी अपनी सहेलियों में मग्न। एक दिन मैं खेलने गया, शाम हो गई, ऐसे तो हमारा खेल खतम नहीं हुआ था, पर मैं पानी पीने घर आया, मैंने माँ की आँखों में पानी देखा, ''माँ क्या हुआ?'' ''कुछ नहीं बेटा।'' और उसने साड़ी के पल्लू से हलके आँख पोंछ ली।''माँ बताओ न क्या हुआ?''''क्या बताऊँ? अभी तुम छोटे हो! और बड़े हो कर भी क्या फ़रक पड़ेगा?'' माँ के स्वर कुछ हलके होते दिखे। मुझे कुछ समझ में नहीं आया और मैं भाग गया फिर से खेलने।''
पर १५ दिन का समय निबंध लिखने के लिए सब बच्चों को मिला था। इन १५ दिनों में राहुल ने माँ के बारे में सब कुछ जान लिया। ''घर में माँ का बर्ताव, रहन-सहन की तुलना बाकी सदस्यों से करते इन १५ दिनों में निबंध जैसा भी हुआ हो, पर मुझे ये खुशी है की माँ को मैं थोड़ा बहुत तो जान ही गया।''
अंतिम चरण में निबंध पहुँचा ही था, राहुल की किताब पर उसीकी आँखों से दो बूँदें गिरी, माँ को थोड़ा बहुत जान लेने की खुशी के आँसूँ थे शायद!!!